Saturday, October 11, 2008

अजीब सोच

बचपन से मैं दुश्मनों से बहुत डरता रहा हूँ /चाहे वे देश के हों या मेरे अपने हों /दुर्बल काया इसका एक कारण हो सकता है /इसलिए में हमेशा कबच ,स्तोत्र ,बज्र पंजर ,चालीसा आदि में तलाशता रहता कि कहीं दुश्मनों से निडर होने की उन्हें मारने की बात मिले /सोमनाथ मन्दिर के वक्त भी ऐसा हुआ था /हम सोचते थे वे त्रशूल वगैरा लेकर आयेंगे =दुश्मन को पता ही नहीं था कि ऐसा होता है उन्हें किसी ने बताया ही नहीं तो वे तयारी करते रहे और हम विस्वास /विश्वास -तयारी -मन्दिर की लूट /खैर छोड़ो /
तो मुझे शिव चालीसा मिल गया ""ले त्रशूल शत्रु को मारो ,संकट से मोहे आन उवारो "" एक दिन जब मैं पाठ कर रहा था तो ले त्रशूल वाली लाइन पर मेरी आवाज़ ऊंची हो गई = " ले त्रशूल शत्रु को मारो "" किचन में से आवाज़ आई ""मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता तुम कुछ भी करलो =मैंने कहा श्रीमती शारदा देवीजी मैं परोपकारी जीव हूँ -बहुजन हिताय बहुजन सुखाय मेरा द्रष्टिकोण है मेरी प्रार्थना का तात्पर्य ये है कि वे त्रशूल लेकर तुम्हारे शत्रु को मारें = बोलीं बात तो वो ही हुई न , मैं कहाँ कहाँ नोमिनेशन लिए फेमिली पेशन को भटकती फिरूंगी

6 comments:

परमजीत बाली said...

बढिया!

प्रदीप मानोरिया said...

मज़ा आ गया श्रीवास्तव जी आपने व्यंग में भाभी जी को भी नहीं बख्शा मेरी नई रचना पढ़ें दिल की बीमारी

Advocate Rashmi saurana said...

bahut badhiya. likhate rahe.
aap mere blog par aaye uske liye aabhar, aapne mujhe likhane ki salah di uske liye bhi aabhar. par me aapko batana chahati hun ki me kavitaye or lekh bhi likhati hu. us blog ka naam hai http://jasvirsaurana.blogspot.com aap ise jarur padhe. aap mere blog par pahali baar aay isliye aap mere dusare blog ke baare me nahi janate. koi baat nahi. aap meri rachanaye padhe. or bataye ki kaha par kami hai. aabhar.

Paliakara said...

लगता है मुझे भी मज़ा आया. अब छापने के लिए किसी का मुह थोड़े ही ताकना है. आप तो लगे रहें.

"SURE" said...

अद्भुत,अद्वितीय,और स्तरीय व्ययंग ......दुश्मन घर के हों या बाहर के तैयारी तो जरुर होनी चाहिए, फॅमिली पेंशन की टेंशन तो जायज है दर दर भटकने का डर एक दम सही है हमारे दफ्तरों का हाल बहुत सकारत्मक नही है

Yogesh Amana said...

बहुत खूब श्रीवास्तव जी ..आनंद आया !!